उत्तर भारत में कुदरत का कहर: उत्तराखंड में टनल धंसी, यूपी-हिमाचल में बारिश और भूस्खलन से हाहाकार
उत्तराखंड राज्य के अत्यंत संवेदनशील और विषम भौगोलिक संरचना वाले चमोली जिले के अंतर्गत आने वाले पीपलकोटी नामक स्थान पर गुरुवार की शाम लगभग सात बजे एक बहुत ही हृदय विदारक, भयावह और अप्रत्याशित प्राकृतिक तथा ढांचागत आपदा उस समय देखने को मिली जब वहां लंबे समय से निर्माणाधीन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुप्रतीक्षित टनल या सुरंग परियोजना के भीतर अचानक से बेतहाशा पानी का सैलाब और पहाड़ों से टूटकर गिरने वाला भारी मात्रा में कीचड़ तथा मलबा बहुत ही तीव्र गति से भर गया, जिसके परिणामस्वरूप उस समय वहां सुरंग के भीतर अपने दैनिक कार्य और कठिन श्रम में पूरी तरह से जुटे हुए कुल बाईस निर्दोष और मेहनतकश मजदूरों में से सात लोगों की अत्यंत दर्दनाक, भयानक और असमय मृत्यु हो गई जिसने न केवल उनके परिवारों बल्कि पूरे इलाके और राज्य में गहरे शोक और मातम की लहर दौड़ा दी है, जबकि इसी बीच राहत और बचाव कार्य करने वाली स्थानीय प्रशासन, एसडीआरएफ और अन्य बचाव टीमों की त्वरित, साहसिक और अथक कार्रवाई के चलते किसी तरह अपनी जान बचाने के लिए उस कीचड़ और पानी में संघर्ष कर रहे बारह अन्य मजदूरों को उस मलबे और पानी के भयानक जाल से सुरक्षित बाहर निकालने में एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई है जिससे उन बारह परिवारों को एक बड़ी राहत मिली है, हालांकि अभी भी इस अत्यंत गहरी, संकरी और घुप्प अंधेरी टनल के अंदर कहीं फंसे हुए शेष तीन मजदूरों की जिंदगी और मौत के बीच झूलती हुई अत्यंत नाजुक स्थिति को देखते हुए उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने के एकमात्र उद्देश्य से राज्य सरकार और राष्ट्रीय आपदा मोचन बलों द्वारा बिना रुके, लगातार और युद्ध स्तर पर एक अत्यंत जटिल, चुनौतीपूर्ण तथा सघन रेस्क्यू ऑपरेशन निरंतर चलाया जा रहा है ताकि हर संभव आधुनिक तकनीक और भारी मशीनों का उपयोग करके उन तीन बहुमूल्य जिंदगियों को समय रहते बचाया जा सके, और इसी भयंकर त्रासदी और अफरा-तफरी के माहौल के बीच एक और हैरान कर देने वाली तथा संभावित रूप से जानलेवा दुर्घटना उस समय घटित हुई जब इसी गढ़वाल संसदीय सीट से लोकसभा का प्रतिनिधित्व करने वाले और जनता के चुने हुए प्रमुख जनप्रतिनिधि यानी सांसद महोदय श्री अनिल बलूनी, जो कि एक जिम्मेदार नेता होने के नाते इस भयानक टनल हादसे में घायल हुए उन तमाम मजलूम मजदूरों का हालचाल जानने, उन्हें सांत्वना और ढांढस बंधाने, तथा अस्पताल में उनसे व्यक्तिगत तौर पर मिलकर उनके बेहतर इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए अपनी कार से इस अत्यंत दुर्गम, खतरनाक और घुमावदार पहाड़ी रास्ते से होकर बहुत ही सावधानी से गुजर रहे थे, तभी अचानक उनके वाहन के ठीक ऊपर पहाड़ की एक बहुत ही ऊंची चोटी से खिसक कर एक अत्यंत विशाल, भारी भरकम और जानलेवा पत्थर यानी एक बहुत बड़ा बोल्डर गुरुत्वाकर्षण के कारण अत्यंत तीव्र गति से नीचे की ओर लुढ़कता हुआ सीधे उनकी चलती हुई कार के ऊपर आ गिरा, जिसके भयानक और विनाशकारी प्रभाव से उनकी गाड़ी का बिल्कुल अगला हिस्सा बहुत ही बुरी तरह से टकराकर पूरी तरह से डैमेज हो गया और उस झटके से कार की आगे की हेडलाइट भी पूरी तरह से चकनाचूर होकर टूट गई, लेकिन इस पूरे खौफनाक घटनाक्रम में सबसे बड़ी राहत, सौभाग्य और ईश्वर की असीम कृपा की बात यह रही कि इस इतने बड़े और रोंगटे खड़े कर देने वाले खतरनाक हादसे के बावजूद उस क्षतिग्रस्त कार के भीतर बैठे सांसद महोदय या उनके साथ यात्रा कर रहे उनके स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों में से किसी भी व्यक्ति को कोई भी शारीरिक चोट या खरोंच तक नहीं आई और वे सभी इस मौत के मुंह से बिल्कुल बाल-बाल और पूरी तरह से सुरक्षित बच गए जिससे प्रशासन ने भी एक बहुत गहरी राहत की सांस ली, वहीं दूसरी ओर अगर हम प्रकृति के इस विनाशकारी और रौद्र रूप की बात करें तो मानसून का यह भयानक कहर केवल हिमालयी राज्य उत्तराखंड की सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि भारत के सबसे बड़े और घनी आबादी वाले पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के कई अलग-अलग और प्रमुख जिलों में भी पिछले कुछ दिनों से लगातार तेज, मूसलाधार और आफत की बारिश का एक अत्यंत भयानक और न रुकने वाला दौर निरंतर जारी है, जिसके चलते वहां की सभी छोटी-बड़ी और प्रमुख नदियों का जलस्तर बहुत ही तेजी से और खतरनाक ढंग से बढ़ रहा है और विशेष रूप से बात की जाए तो उत्तर प्रदेश की प्रमुख औद्योगिक और ऐतिहासिक नगरी कानपुर में तो जीवनदायिनी और आस्था का केंद्र मानी जाने वाली पवित्र गंगा नदी का जलस्तर इतनी खतरनाक और डरावनी गति से बढ़ चुका है कि उसका पानी अब प्रशासन द्वारा निर्धारित किए गए खतरे के निशान को लगभग छूने ही वाला है या उसके बिल्कुल करीब पहुंच गया है, जिससे शहर के तमाम निचले इलाकों, बस्तियों और नदी के किनारे बसे हुए रिहायशी क्षेत्रों में बाढ़ का पानी घुसने और जनजीवन के पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाने के साथ-साथ भारी तबाही मचने का एक बहुत ही गंभीर और चिंताजनक अंदेशा पैदा हो गया है जिसको लेकर स्थानीय प्रशासन लगातार अलर्ट जारी कर रहा है और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दे रहा है, इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के ही एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण, प्राचीन और विश्व प्रसिद्ध धार्मिक शहर वाराणसी यानी काशी में भी गंगा नदी के जलस्तर में हुई इस बेतहाशा, अचानक और निरंतर वृद्धि ने एक बहुत ही भारी तबाही और अव्यवस्था मचाई है जिसके सीधे प्रभाव के कारण वहां के विश्व प्रसिद्ध और अत्यंत पवित्र माने जाने वाले घाटों के ठीक किनारे पर स्थित सौ से भी अधिक छोटे-बड़े, प्राचीन और स्थानीय मंदिर पूरी तरह से बाढ़ के इस उफनते पानी में जलमग्न हो गए हैं और पूरी तरह से डूब चुके हैं, जिसके कारण न केवल वहां सदियों से निरंतर होने वाली दैनिक गंगा आरती, पूजा-पाठ और तमाम तरह के धार्मिक अनुष्ठान बहुत ही बुरी तरह से प्रभावित और बाधित हुए हैं बल्कि देश-विदेश और दूर-दराज के इलाकों से अपनी गहरी आस्था लेकर वहां पहुंचने वाले हजारों-लाखों श्रद्धालुओं, तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही भी सुरक्षा कारणों से पूरी तरह से ठप होकर रह गई है जिससे वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन पर भी बहुत ही गहरा और नकारात्मक असर पड़ा है, और इस प्रकार की लगातार हो रही भारी मानसूनी बारिश, भयानक बाढ़ और उससे उत्पन्न होने वाली इन तमाम प्राकृतिक आपदाओं का यह विनाशकारी सिलसिला यहीं पर समाप्त नहीं होता है क्योंकि उत्तर भारत के एक और बेहद खूबसूरत लेकिन पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी इस बार की भारी और असामान्य मानसूनी बारिश तथा उसके कारण पहाड़ों पर जगह-जगह हो रहे भयंकर भूस्खलन यानी लैंडस्लाइड की घटनाओं ने वहां के संपूर्ण जनजीवन, सड़क मार्गों और विशेष रूप से रेल यातायात को बहुत ही बुरी तरह से प्रभावित, छिन्न-भिन्न और पूरी तरह से ठप कर दिया है, जिसकी सबसे स्पष्ट, दुखद और गंभीर बानगी हिमाचल प्रदेश के ऐतिहासिक कांगड़ा जिले में प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिली है जहां स्थित अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध पठानकोट-बैजनाथ पपरोला रेल सेक्शन के एक प्रमुख ट्रैक के ठीक ऊपर आसपास के कच्चे और बारिश से भीगे हुए पहाड़ों से खिसक कर आई विशालकाय चट्टानों और मलबे के अचानक से गिर जाने के कारण वह पूरा का पूरा ऐतिहासिक रेल मार्ग पूरी तरह से बाधित, अवरुद्ध और क्षतिग्रस्त हो गया है और भविष्य में होने वाले किसी भी संभावित और गंभीर खतरे तथा प्राकृतिक आपदा के इस उच्च जोखिम को बहुत ही बारीकी से ध्यान में रखते हुए रेलवे प्रशासन ने अपने यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा को अपनी सबसे पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अगले आदेश तक इस प्रभावित ट्रैक पर चलने वाली कम से कम चार अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यस्त ट्रेन सेवाओं को एहतियात के तौर पर पूरी तरह से रद्द करने का एक बहुत ही कड़ा और आवश्यक फैसला किया है ताकि इस खराब मौसम और अस्थिर भौगोलिक परिस्थितियों में किसी भी प्रकार की कोई जनहानि या बड़ी रेल दुर्घटना से पूरी तरह से बचा जा सके और यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जब तक मौसम की स्थिति पूरी तरह से सामान्य और अनुकूल नहीं हो जाती तथा उस रेल ट्रैक के ऊपर से उन गिरी हुई भारी चट्टानों और तमाम मलबे को भारी मशीनों की सहायता से पूरी तरह से हटाकर उसे यातायात और ट्रेनों के सुरक्षित परिचालन के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह से सुरक्षित घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक किसी भी स्थिति में किसी भी ट्रेन का परिचालन वहां से नहीं किया जाएगा जिससे आम यात्रियों को हालांकि थोड़ी असुविधा का सामना जरूर करना पड़ रहा है लेकिन उनकी सुरक्षा के मद्देनजर उठाए गए इस कदम को अत्यंत आवश्यक और समय की मांग माना जा रहा है क्योंकि पहाड़ों पर इस समय प्रकृति का जो उग्र और अनियंत्रित रूप देखने को मिल रहा है वह मानव निर्मित किसी भी ढांचे और व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है।