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Breaking news - World - June 15, 2026

अमेरिका-ईरान में ऐतिहासिक समझौता: 107 दिनों की जंग खत्म, जेनेवा में 19 जून को MoU पर होंगे दस्तखत

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इस वक्त वैश्विक कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और मिडिल ईस्ट (Middle East) के युद्ध क्षेत्र से सदी की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आ रही है। पिछले 107 दिनों से जारी भीषण तबाही, मिसाइलों की बौछार, सैकड़ों सैनिकों की मौत और वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख देने वाले महा-संग्राम के बाद आखिरकार दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान युद्ध को पूरी तरह खत्म करने के लिए राजी हो गए हैं। रविवार की देर रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर केवल तीन शब्द लिखकर पूरी दुनिया के बाजारों और राष्ट्रप्रमुखों को चौंका दिया—“समझौता हो गया है।” इसके तुरंत बाद ईरान की सरकार ने भी तेहरान से अपना आधिकारिक बयान जारी कर इस महा-डील की पुष्टि कर दी है।

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के तहत आगामी 19 जून को स्विट्जरलैंड की धरती (जेनेवा) पर दोनों देशों के उच्च प्रतिनिधि एक बेहद महत्वपूर्ण मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी MoU पर हस्ताक्षर करेंगे। इस महा-डील के होते ही पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीतिक और सामरिक तस्वीर पूरी तरह से बदल गई है। लेकिन इस डील के पीछे की असल कहानी क्या है? पर्दे के पीछे कौन सी शर्तें तय हुईं? आखिरकार इस 107 दिनों की खूनी जंग में कौन जीता और कौन हारा? और इस समझौते का आपकी जेब पर, भारत देश पर और पूरी दुनिया पर क्या सीधा असर पड़ने वाला है? आज हम इस विशेष और विस्तृत विश्लेषण में 7 सबसे जरूरी और बड़े सवालों के जवाबों के जरिए इस पूरी अंतरराष्ट्रीय डील का एक-एक पन्ना डिकोड करेंगे।

❓ सवाल 1: क्या अमेरिका और ईरान में वाकई जंग खत्म हो गई है या यह सिर्फ एक अस्थायी सीजफायर है?

जवाब: 14 जून 2026 की देर रात इस ऐतिहासिक शांति समझौते का पहला और आधिकारिक ऐलान अमेरिका या ईरान से नहीं, बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से हुआ। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपनी एक विस्तृत सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दुनिया को बताया:

“अमेरिका और ईरान के बीच एक व्यापक और ऐतिहासिक शांति समझौता फाइनल हो चुका है। दोनों देश लेबनान के मोर्चे सहित दुनिया के तमाम युद्ध क्षेत्रों में अपने सभी मिलिट्री ऑपरेशन्स (सैन्य कार्रवाइयां) तुरंत प्रभाव से बंद करने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए हैं।”

शहबाज शरीफ के इस सनसनीखेज ट्वीट के ठीक कुछ मिनटों बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी अपने आधिकारिक प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करके इस डील को पूरी तरह कंफर्म कर दिया। ट्रम्प ने अपने ही चिर-परिचित कॉर्पोरेट अंदाज में लिखा:

“ईरान के साथ डील अब पूरी तरह लॉक हो चुकी है। दुनिया के तमाम जहाजों, अपने इंजन चालू कर लो! तेल को वैश्विक बाजारों में खुलकर बहने दो!”

ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी तुरंत पुष्टि की कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से एक व्यापक रूपरेखा (MoU) तैयार कर ली है, जिसके तहत ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) को तुरंत हटाया जाएगा और मौजूदा सीजफायर को आगे बढ़ाया जाएगा।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस घोषणा को ‘जंग का पूर्ण अंत’ कहना अभी बहुत बड़ी जल्दबाजी होगी। डॉक्टरों और रणनीतिकारों ने इसके पीछे तीन बेहद बड़े और तार्किक कारण बताए हैं:

  • 1. खुद डोनाल्ड ट्रम्प का दोहरा रवैया: ट्रम्प ने भले ही युद्ध रोकने की घोषणा कर दी है, लेकिन उन्होंने अपने बयान में यह भी साफ किया है कि असली परीक्षा आगामी 60 दिनों के भीतर होगी। अगर ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने और यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को पूरी तरह सरेंडर करने पर अमेरिकी शर्तों को नहीं माना, तो अमेरिका दोबारा बेहद सख्त सैन्य कदम उठा सकता है।
  • 2. इजराइल का बेहद आक्रामक और बागी रुख: इस समझौते की घोषणा के महज कुछ ही घंटे पहले इजराइल की वायुसेना ने दक्षिणी लेबनान पर भीषण बमबारी की। इजराइल ने साफ संकेत दिए हैं कि वह इस समझौते को नहीं मानता और लेबनान से अपनी सेना किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटाएगा। इजराइल के कट्टरपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन ग्वीर ने तो इस अमेरिका-ईरान पीस डील पर खुलेआम गहरी नाराजगी जताते हुए इसे इजराइल की पीठ में छुरा घोंपने जैसा करार दिया है।
  • 3. ईरान की कड़क और अपरिवर्तनीय शर्तें: ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यह डील तभी तक टिकी रहेगी जब तक अमेरिका इन तीन कदमों को पूरी तरह लागू रखेगा—पहली, ईरानी तटों से नौसैनिक नाकेबंदी तुरंत हटे; दूसरी, ईरान के खिलाफ तमाम सैन्य कार्रवाइयां हमेशा के लिए रुकें; और तीसरी, दुनिया भर के बैंकों में फ्रीज किए गए ईरान के अरबों डॉलर के फंड्स को तुरंत रिलीज किया जाए।

अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, 19 जून को जेनेवा में होने वाले इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति ट्रम्प या उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस डिजिटल माध्यम से इस MoU पर हस्ताक्षर करेंगे, जिसके बाद अगले 60 दिनों तक दोनों देशों के राजनयिकों के बीच कड़े दौर की वार्ता होगी ताकि इसे एक फाइनल और स्थायी इंटरनेशनल ट्रीटी (संधि) में बदला जा सके।

❓ सवाल 2: पाकिस्तान या कतर; पर्दे के पीछे अंदरखाने इस नामुमकिन डील को किसने मुमकिन कराया?

जवाब: जब यह 107 दिन पहले जंग शुरू हुई थी, तो पूरी दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी। इस दौरान सुलह कराने की कमान और मध्यस्थता (Mediation) का जिम्मा सबसे पहले पाकिस्तान ने संभाला था, लेकिन कूटनीति के आखिरी ओवर में बाजी पूरी तरह से छोटे लेकिन बेहद अमीर और प्रभावशाली देश कतर के हाथ में आ गई।

आइए इस सीक्रेट डिप्लोमेसी की पूरी टाइमलाइन को बहुत ही बारीकी से समझते हैं:

[अमेरिका-ईरान महा-डील का सीक्रेट कूटनीतिक सफरनामा]
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• 3 मार्च 2026 ──► पाक विदेश मंत्री इशाक डार ने पहली बार पाकिस्तानी संसद में 
                    इस्लामाबाद में सीजफायर वार्ता कराने का प्रस्ताव रखा।
• 18 मार्च 2026 ─► इशाक डार सऊदी अरब पहुंचे; सऊदी, तुर्किए और मिस्र के साथ 
                    मिलकर पहली बार शांति समझौते का ब्लू प्रिंट तैयार किया।
• 7 अप्रैल 2026 ─► डोनाल्ड ट्रम्प ने 2 हफ्तों के सीजफायर का ऐलान किया और लिखा 
                    कि यह फैसला उन्होंने शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर के कहने पर किया।
• 12 अप्रैल 2026 ► इस्लामाबाद में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की 21 घंटे लंबी 
                    मैराथन बैठक हुई, जो बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई।
• 23 मई 2026 ───► पाक सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर खुद तेहरान पहुंचे और ईरानी 
                    विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मिलकर 60 दिन का सीजफायर बढ़वाया।
• जून 2026 ──────► कतर ने फ्रंट सीट संभाली; दोहा में ईरान के फ्रीज्ड फंड्स और 
                    होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर फाइनल डील लॉक हुई।
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14 जून को भले ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक्स (X) पर 24 घंटे के भीतर डील फाइनल होने का क्रेडिट लेने की कोशिश की, लेकिन हकीकत यह थी कि उस आखिरी दिन पाकिस्तान का कोई भी बड़ा अधिकारी या राजनयिक ईरान या अमेरिका में मौजूद नहीं था।

दिल्ली स्थित विख्यात थिंक टैंक ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ (ORF) में मिडिल ईस्ट मामलों के वरिष्ठ विशेषज्ञ कबीर तनेजा ने इस पर एक बेहद महत्वपूर्ण इनसाइड पॉइंट साझा किया है। तनेजा बताते हैं:

“इस पूरे शांति समझौते में कतर की एंट्री विशुद्ध रूप से आर्थिक और वित्तीय वजहों से हुई है। आने वाले दिनों में जब इस समझौते के तहत ईरान अपने पैसों और फंड्स की मांग करेगा, तो वे तमाम पैसे कतर के बैंकों के जरिए ही ईरान को ट्रांसफर किए जाएंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईरान के फ्रीज किए गए अंतरराष्ट्रीय फंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा कतर के बैंकों में ही सुरक्षित बंद है। अगर डोनाल्ड ट्रम्प खुद अमेरिकी ट्रेजरी से सीधे ईरान को पैसे भेजते, तो अमेरिकी संसद में उनकी किरकिरी होती और अमेरिका की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद कमजोर दिखाई देती। इसलिए कतर को एक सुरक्षित वित्तीय पुल (Financial Bridge) बनाया गया।”

प्रसिद्ध डिफेंस एनालिस्ट नितिन ए. गोखले का भी यही सटीक आकलन है कि पाकिस्तान के पास आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर इतना अंतरराष्ट्रीय दम या साख नहीं थी कि वह दोनों कट्टर दुश्मन देशों को एक टेबल पर लाकर दस्तखत करा सके। आखिरकार कतर के अमीर और उनकी वित्तीय साख के दखल से ही यह नामुमकिन डील मुमकिन हो सकी है। हालांकि, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एसोसिएट रिसर्चर डॉ. यासिर अली मिर्जा इसे किसी एक देश की व्यक्तिगत जीत मानने से पूरी तरह इनकार करते हैं। उनके मुताबिक यह डील पाकिस्तान, कतर, मिस्र, सऊदी अरब और ओमान के साझा और सामूहिक क्षेत्रीय प्रयासों का एक बेहतरीन नतीजा है।

❓ सवाल 3: इस ऐतिहासिक समझौते के तहत दोनों देश किन-किन गुप्त और मुख्य शर्तों पर राजी हुए हैं?

जवाब: यद्यपि आधिकारिक तौर पर 19 जून से पहले इस शांति समझौते की आधिकारिक प्रतिलिपि या ड्राफ्ट जारी नहीं किया गया है, लेकिन ईरानी समाचार एजेंसी मेहर और ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने खुफिया सूत्रों के हवाले से इस महा-डील के 14 सबसे महत्वपूर्ण और मुख्य पॉइंट्स का पूरा खाका (Draft Points) दुनिया के सामने रख दिया है।

आइए इन गुप्त और रणनीतिक शर्तों को एक विस्तृत टेबल के जरिए विस्तार से समझते हैं:

क्र.सं.शांति समझौते की मुख्य शर्तें और वादेअमेरिका का रुख / कदमईरान का रुख / कदम
1सैन्य कार्रवाइयों पर पूर्ण रोकलेबनान, सीरिया और यमन में ईरान समर्थित गुटों पर सभी हवाई और नौसैनिक हमले तुरंत रोकेगा।अमेरिकी नौसेना के जहाजों और ठिकानों पर मिसाइल व ड्रोन हमले पूरी तरह बंद करेगा।
2होर्मुज जलडमरूमध्य का मोर्चाईरान के तटीय इलाकों और बंदरगाहों से अपनी आक्रामक नौसैनिक नाकेबंदी तुरंत हटा लेगा।अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल जहाजों और तेल टैंकरों के लिए होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता पूरी तरह खोलेगा।
3फ्रीज्ड फंड्स की रिहाईकतर और अन्य यूरोपीय बैंकों में जमा ईरान के अरबों डॉलर के जब्त एसेट्स को अनफ्रीज करने की अनुमति देगा।इन पैसों का इस्तेमाल केवल देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और नागरिक कल्याण के लिए करने पर राजी हुआ।
4परमाणु कार्यक्रम पर लगामईरान के शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर लगे कुछ कड़े प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से शिथिल करेगा।यूरेनियम संवर्धन की क्षमता को तय सीमा से आगे न बढ़ाने और IAEA की जांच के लिए राजी हुआ।
5कैदियों की अदला-बदलीअमेरिका की जेलों में बंद ईरान के कुछ वैज्ञानिकों और रणनीतिकारों को रिहा करेगा।ईरान की जेलों में बंद अमेरिकी नागरिकों और जासूसों को तुरंत रिहा करके उनके देश भेजेगा।

❓ सवाल 4: आखिरकार 107 दिनों की इस भयंकर और खूनी जंग में किसकी जीत हुई और कौन हारा?

जवाब: अगर हम इस युद्ध के इतिहास, दोनों देशों द्वारा शुरू में तय किए गए लक्ष्यों और वर्तमान समझौते की शर्तों का एक निष्पक्ष और तटस्थ मूल्यांकन करें, तो इस जंग में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का पलड़ा सुपरपावर अमेरिका पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।

जियोपॉलिटिकल और मिलिट्री एक्सपर्ट्स ने इसके पीछे कई बेहद ठोस और अकाट्य तर्क दिए हैं:

  • डिफेंस एक्सपर्ट नितिन ए. गोखले का कड़ा विश्लेषण: “अगर जेनेवा से आ रही MoU की खबरें 100% सही हैं, तो यह साफ है कि सुपरपावर अमेरिका यह जंग बुरी तरह हार गया है। ईरान की इकॉनमी पहले से ही प्रतिबंधों के कारण बेहद कमजोर थी और उसकी सैन्य शक्ति भी अमेरिका के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती, इसके बावजूद ईरान ने पिछले 107 दिनों तक अमेरिका और इजराइल के भीषण और दोहरे हमलों को न सिर्फ झेला, बल्कि उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। लेबनान में उसका सबसे बड़ा प्रॉक्सी संगठन हिजबुल्ला आज भी पूरी ताकत के साथ मैदान में डटा हुआ है। इतना ही नहीं, ईरान ने युद्ध के मैदान में अमेरिका को झुकाकर अपने फ्रीज किए गए अरबों डॉलर वापस रिलीज कराने की अपनी सबसे बड़ी शर्त भी मनवा ली।”
  • कबीर तनेजा का रणनीतिक दृष्टिकोण: “जब 107 दिन पहले अमेरिका ने इस जंग की शुरुआत की थी, तो राष्ट्रपति ट्रम्प के दो बेहद स्पष्ट और घोषित मकसद थे—पहला, ईरान के तमाम न्यूक्लियर (परमाणु) ठिकानों को बमबारी करके हमेशा के लिए जमींदोज करना; और दूसरा, तेहरान की इस्लामिक सरकार को उखाड़कर वहां सत्ता-परिवर्तन (Regime Change) करना। आज 107 दिनों के बाद इन दोनों में से एक भी मकसद पूरा नहीं हो सका है। असल में नवंबर के महीने में अमेरिका के भीतर मिड-टर्म (मध्यावधि) चुनाव होने वाले हैं। ट्रम्प को अपनी घरेलू राजनीतिक लोकप्रियता को भी बचाना है और युद्ध के कारण अमेरिका में आसमान छू रही तेल और गैस की कीमतों को भी कंट्रोल में लाना है। अपनी घरेलू राजनीति को मैनेज करने के चक्कर में ट्रम्प को यह कदम उठाना पड़ा है, जो साफ तौर पर उनकी एक बहुत बड़ी डिप्लोमैटिक और रणनीतिक हार है।”
  • डॉ. यासिर अली मिर्जा का आर्थिक विश्लेषण: “ईरान का इस जंग में पहले दिन से ही ‘अपर हैंड’ यानी बढ़त थी। उसने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को पूरी तरह चोक (बंद) करके ग्लोबल इकॉनमी का गला घोंट दिया था, जिसके कारण ट्रम्प प्रशासन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी दबाव बन गया था। इसके साथ ही, ईरान की मिसाइल टेक्नोलॉजी ने समुद्र में अमेरिका के अत्याधुनिक फाइटर जेट्स और नौसैनिक जहाजों को भी भारी नुकसान पहुंचाया।”

खुद ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने इस जीत के बाद गर्व से तेहरान में कहा:

“दुश्मन महाशक्ति ने हमारे वजूद को मिटाने और अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए हम पर चौतरफा हमला किया था, लेकिन वह हमारे हौसलों के आगे पूरी तरह नाकाम रहा। हमने इस ऐतिहासिक जंग में एक बहुत बड़ी और संप्रभु जीत हासिल की है।”

इसके विपरीत, डोनाल्ड ट्रम्प ने जब इस शांति समझौते का ऐलान किया, तो उन्होंने अपनी पोस्ट में कहीं भी ‘जीत’ शब्द का जिक्र तक नहीं किया, जबकि कुछ हफ्ते पहले तक वे सोशल मीडिया पर ईरान को दुनिया के नक्शे से पूरी तरह नेस्तनाबूद करने की खुलेआम धमकियां दे रहे थे।

❓ सवाल 5: मध्य पूर्व का सबसे आक्रामक देश इजराइल इस महा-डील से खुश है या नाराज?

जवाब: जैसा कि पहले से ही पूरी तरह अपेक्षित था, इजराइल इस अमेरिका-ईरान शांति समझौते से बेहद ज्यादा नाराज, निराश और नाखुश है। इजराइल की सरकार को लगता है कि अमेरिका ने अपने फायदे के लिए ईरान को खुला छोड़ दिया है, जिससे इजराइल के अस्तित्व पर खतरा और ज्यादा बढ़ जाएगा।

इजराइल के कट्टरपंथी और दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने डील के तुरंत बाद एक बेहद तल्ख बयान जारी करते हुए कहा:

“अमेरिका और ईरान के बीच बंद कमरों में हुए इस तथाकथित शांति समझौते से इजराइल का देश और हमारी सेना किसी भी रूप में बंधी हुई नहीं है। हम अपने दुश्मनों के खिलाफ अपना अभियान स्वतंत्र रूप से जारी रखेंगे।”

रणनीतिक मामलों के जानकार कबीर तनेजा का भी यही मानना है कि यह डील बेंजामिन नेतन्याहू और इजराइल के लिए बहुत ही बुरी खबर है। यही वजह है कि ट्रम्प के बार-बार व्यक्तिगत रूप से कहने के बावजूद इजराइल ने लेबनान पर अपने हमले रत्ती भर भी कम नहीं किए। समझौते की घोषणा वाले दिन यानी 14 और 15 जून को भी इजराइल के लड़ाकू विमानों ने दक्षिणी लेबनान के रिहायशी इलाकों में कई खतरनाक मिसाइलें दागीं।

हालांकि, इस भयंकर तबाही और युद्ध के बीच इजराइल रणनीतिक रूप से एक बहुत बड़ी जमीनी बढ़त हासिल करने में जरूर कामयाब रहा है, जिसे वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता:

[लेबनान मोर्चे पर इजराइल की नई सामरिक स्थिति]
       │
       ├─► 2,000 वर्ग किमी जमीन पर कब्जा ─── इजरायली सेना ने लेबनान के भीतर घुसकर बड़े इलाके को सील किया।
       │
       ├─► लितानी नदी के पार सैन्य पहुंच ───── पहले टारगेट सिर्फ लितानी तक था, अब सेना नबातीह शहर तक पहुंची।
       │
       ├─► 'नो-गो ज़ोन' (No-Go Zone) निर्माण ─ सीमावर्ती गांवों के सभी घरों और आतंकी ढांचों को ढहाने की नीति।
       │
       └─► स्थाई सैन्य ठिकाने ──────────────── कब्जाई गई जमीन को भविष्य में न लौटाने का रक्षा मंत्रालय का ऐलान।

इजराइल के नवनियुक्त रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने अपनी सरकार की नीति को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को और उन्होंने खुद अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को बहुत ही कड़े शब्दों में यह साफ कर दिया है कि इजरायली सेना लेबनान के इन कब्जाए गए बफर जोन वाले इलाकों में स्थायी रूप से बनी रहेगी। वे इन इलाकों से स्थानीय नागरिकों को पूरी तरह हटाकर जमीन के ऊपर और नीचे मौजूद हिजबुल्ला के तमाम बंकरों और आतंकी ढांचों को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद कर देंगे ताकि इजराइल की उत्तरी सीमा को हमेशा के लिए सुरक्षित किया जा सके।

❓ सवाल 6: अमेरिका-ईरान के बीच हुए इस शांति समझौते का भारत समेत पूरी दुनिया पर क्या सीधा असर पड़ेगा?

जवाब: इस शांति समझौते के लागू होते ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं ने बहुत बड़ी राहत की सांस ली है। इस जंग के कारण बंद हुए ‘होर्मुज स्ट्रेट’ के खुलने से दुनिया भर के सामने मंडरा रहा ऊर्जा और ईंधन का एक बहुत बड़ा संकट पूरी तरह टल गया है।

आइए इस समझौते के आर्थिक और रणनीतिक प्रभावों को बहुत ही सरल भाषा में और पॉइंट्स के जरिए समझते हैं:

  • 1. कच्चे तेल (Crude Oil) के दामों में ऐतिहासिक गिरावट: बीते 28 फरवरी 2026 को जब यह जंग शुरू होने वाली थी, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत महज 72 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन जंग के दौरान होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से यह आसमान छूती हुई रिकॉर्ड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। 12 जून तक यह 86 डॉलर के आसपास मंडरा रही थी। लेकिन जैसे ही रविवार को इस शांति समझौते का आधिकारिक ऐलान हुआ, महज 24 घंटे के भीतर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 4.1% की भारी गिरावट दर्ज की गई। दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा मानक माना जाने वाला ‘ब्रेंट क्रूड’ (Brent Crude) टूटकर तुरंत 83.75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जैसे ही 19 जून को आधिकारिक साइन होंगे, तेल की कीमतें और तेजी से नीचे गिरेंगी।
  • 2. भारत में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस (LPG) के दाम होंगे सस्ते: इस 107 दिनों की ईरान जंग के चलते भारत में आम जनता पर महंगाई का भारी बोझ पड़ा था और देश में पेट्रोल और डीजल के दाम औसतन 7.5 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ गए थे। इस भारी बढ़ोतरी के बावजूद भारत की सरकारी तेल कंपनियों (IOC, HPCL, BPCL) को कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों के कारण हर दिन लगभग 900 करोड़ रुपए का भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा था। अब कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय मार्केट में तेजी से गिरने के कारण भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ी कटौती का रास्ता साफ हो गया है, जिससे आम आदमी को बड़ी राहत मिलेगी और तेल कंपनियों का घाटा भी पूरा हो सकेगा। इसके साथ ही, जंग के दौरान घरेलू एलपीजी (LPG) सिलेंडर के दामों में जो 74.2 रुपए और कमर्शियल सिलेंडर में जो 1,422 रुपए की भारी वृद्धि हुई थी, वह भी अब धीरे-धीरे वापस नीचे आएगी।
  • 3. डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए (INR) को मिलेगी भारी मजबूती: जंग शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसे निकालने और महंगे तेल के आयात के कारण डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए में 5% से ज्यादा की ऐतिहासिक गिरावट देखी गई थी। 28 फरवरी को जो 1 डॉलर महज 91.08 रुपए का हुआ करता था, वह इस युद्ध की विभीषिका के कारण 12 जून तक अपने ऑल-टाइम लो स्तर यानी 95.1 रुपए तक पहुंच चुका था। अब युद्ध रुकने और वैश्विक व्यापार सामान्य होने से रुपया दोबारा डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 91 से 92 के स्तर पर वापस लौट सकता है।

हालांकि, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में फॉरेन अफेयर्स के प्रोफेसर राजन कुमार इस पर एक बहुत ही व्यावहारिक और सचेत करने वाली राय रखते हैं। प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं:

“जंग भले ही आज रुक गई हो, लेकिन आम जनता के लिए पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत पुराने स्तर पर आने में कम से कम 6 से 9 महीने का लंबा समय लग सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दुनिया की तमाम बड़ी तेल कंपनियां अक्सर ‘लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स’ पर तेल खरीदती और बेचती हैं। भारत की कंपनियों ने भी 3 से 6 महीने पहले ही महंगे दामों पर तेल खरीदने के सौदे लॉक कर रखे हैं। इसलिए इस वैश्विक गिरावट का सीधा और पूरा असर घरेलू मार्केट में दिखने में थोड़ा समय लगेगा।”

इसके रणनीतिक पहलू पर प्रकाश डालते हुए डॉ. यासिर अली मिर्जा बताते हैं कि इस जंग के रुकने से ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों में बड़ी ढील मिलेगी। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत को यह होगा कि भारत और ईरान द्वारा मिलकर विकसित किए जा रहे बेहद रणनीतिक चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) पर व्यापार और कार्गो शिपमेंट कई गुना बढ़ जाएगा। इस बंदरगाह के पूरी तरह एक्टिव होने से भारतीय सामान पाकिस्तान को बाईपास करके सीधे ईरान, युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और पूरे मध्य एशिया (Central Asia) के बाजारों तक बेहद कम लागत में पहुंच सकेगा, जो भारत के व्यापार के लिए एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होगा।

❓ सवाल 7: क्या अमेरिका और ईरान की यह बहुचर्चित डील भविष्य में टिकेगी या इसके दोबारा टूटने का सबसे बड़ा खतरा क्या है?

जवाब: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की बिसात पर हुए इस समझौते को लेकर जहां एक तरफ भारी उत्साह है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के बड़े-बड़े नीति-नियंताओं और डिफेंस एक्सपर्ट्स को यह डर सता रहा है कि यह डील कांच के एक नाजुक बर्तन जैसी है, जो कभी भी टूट सकती है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस डील के भविष्य में पूरी तरह से फ्लॉप होने या टूटने के 3 सबसे बड़े और परमानेंट खतरे मौजूद हैं:

  • खतरा नंबर 1: इजराइल का कोई भी आत्मघाती या बड़ा हमला: वरिष्ठ विश्लेषक कबीर तनेजा के मुताबिक, “60 दिनों की बातचीत और फाइनल एग्रीमेंट तो बहुत दूर की बात है, इस डील के टूटने का सबसे पहला और इमीडिएट खतरा यह है कि आगामी 19 जून को जेनेवा में होने वाले MoU साइनिंग से पहले ही अगर इजराइल की सेना ने लेबनान या सीधे ईरान के किसी ठिकाने पर कोई बड़ा मिसाइल या ड्रोन हमला कर दिया, तो ईरान इस सीजफायर समझौते को उसी सेकंड कूड़ेदान में फेंक देगा और होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा पूरी तरह से ब्लॉक कर देगा।”
  • खतरा नंबर 2: यूरेनियम और न्यूक्लियर सरेंडर का मुख्य पेंच: इस समझौते में ईरान केवल अपने परमाणु कार्यक्रम पर ‘चर्चा करने’ और IAEA के निरीक्षकों को अपने ठिकानों की जांच करने देने पर राजी हुआ है। लेकिन अमेरिका की शुरू से यह कड़वी और अपरिवर्तनीय शर्त रही है कि ईरान अपने पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के पूरे स्टॉक को पूरी तरह से नष्ट करे या अमेरिका के हवाले कर दे। अगर अगले 60 दिनों की वार्ता के दौरान ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह बंद करने से साफ मना कर दिया, तो डोनाल्ड ट्रम्प एक झटके में इस समझौते को रद्द कर देंगे।
  • खतरा नंबर 3: ईरान के भीतर का घरेलू राजनीतिक असंतोष: ईरान के भीतर मौजूद कट्टरपंथी धड़े और वहां की सेना यानी ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के आला कमांडर अमेरिका के साथ किसी भी तरह के समझौते को ‘इस्लाम और देश के साथ गद्दारी’ मानते हैं। अगर ईरान की सरकार पर वहां के आंतरिक कट्टरपंथियों का दबाव बढ़ा, तो वे अपनी साख बचाने के लिए दोबारा युद्ध का रास्ता चुन सकते हैं।

हालांकि, इन तमाम खतरों और आशंकाओं के बावजूद डॉ. यासिर अली मिर्जा एक सकारात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण रखते हैं। उनका मानना है कि यह मौजूदा अस्थायी डील आखिरकार एक फाइनल और स्थायी एग्रीमेंट में जरूर बदलेगी और मिडिल ईस्ट की यह जंग पूरी तरह खत्म होगी। इसके पीछे का सबसे बड़ा व्यावहारिक सच यह है कि इस समय अमेरिका और ईरान, दोनों ही देश इस युद्ध को आगे खींचने की आर्थिक और सैन्य स्थिति में बिल्कुल भी नहीं हैं। 107 दिनों की इस जंग में ईरान के बुनियादी ढांचे, तेल रिफाइनरियों और अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का भयंकर नुकसान हुआ है। ईरान इस समय किसी भी कीमत पर चाहेगा कि युद्ध तुरंत रुके, उसके विदेशों में फंसे फंड्स वापस रिलीज हों ताकि वह अपने देश के भीतर मची आर्थिक तबाही और भुखमरी को संभाल सके।

अमेरिका-ईरान के बीच हुए इस ऐतिहासिक शांति समझौते, सुपरपावर अमेरिका के पीछे हटने और भारत के तेल बाजारों पर पड़ने वाले इस बड़े असर को लेकर आपकी अपनी बेबाक और महत्वपूर्ण राय क्या है? क्या आपको लगता है कि डोनाल्ड ट्रम्प का यह फैसला सही है या इजराइल इस डील को तोड़कर दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की तरफ धकेल देगा? नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया जरूर साझा करें।